दिल्ली में सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था पर उठते सवाल
दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
दिल्ली के सरकारी स्कूलों में स्थायी शिक्षकों की कमी एक बार फिर राजनीतिक बहस का केंद्र बन गई है। दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष देवेन्द्र यादव ने भाजपा की रेखा गुप्ता सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों गरीब और मध्यम वर्गीय बच्चों का भविष्य अंधकार में जा रहा है। उनका कहना है कि शिक्षा जैसी संवेदनशील जिम्मेदारी को सरकार अस्थायी इंतजामों के भरोसे छोड़ चुकी है।
स्थायी शिक्षकों की कमी का आंकड़ों में सच
देवेन्द्र यादव के अनुसार दिल्ली के सरकारी स्कूलों में लगभग 80 हजार स्थायी शिक्षकों की आवश्यकता है, जबकि वर्तमान में केवल 44 हजार स्थायी शिक्षक ही कार्यरत हैं। शेष व्यवस्था गेस्ट टीचर और अनुबंधित शिक्षकों के सहारे चल रही है। उन्होंने कहा कि करीब 10 हजार पद आज भी खाली पड़े हैं, लेकिन सरकार उन्हें भरने के प्रति गंभीर नजर नहीं आती।
गेस्ट और अनुबंधित शिक्षकों पर निर्भर सिस्टम
कांग्रेस अध्यक्ष ने बताया कि दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था लगभग 23 से 24 हजार गेस्ट और अनुबंधित शिक्षकों के कंधों पर टिकी हुई है। ये शिक्षक न केवल नौकरी की अनिश्चितता से जूझ रहे हैं, बल्कि कम वेतन और सुविधाओं की कमी के कारण मानसिक दबाव में भी रहते हैं। ऐसे हालात में उनसे छात्रों को शत-प्रतिशत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की उम्मीद करना अव्यावहारिक है।
फीस वृद्धि और सरकारी स्कूलों की अनदेखी
देवेन्द्र यादव ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता निजी स्कूलों की फीस वृद्धि जैसे गंभीर मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं। उनका कहना है कि सरकार अदालत में भी छात्रों और अभिभावकों का पक्ष मजबूती से नहीं रख पाई, जिसके कारण अभिभावकों को बढ़ी हुई फीस चुकाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। वहीं सरकारी स्कूलों की शिक्षा गुणवत्ता पर सरकार की चिंता साफ तौर पर नदारद दिखती है।
भर्ती प्रक्रिया में प्रशासनिक अड़चनें
उन्होंने यह भी बताया कि सरकार ने 10 हजार पदों में से केवल 6787 पदों को भरने के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू की थी, लेकिन वह भी प्रशासनिक अड़चनों के चलते रुकी हुई है। इससे साफ है कि शिक्षा विभाग में निर्णय लेने की गति बेहद धीमी है, जिसका सीधा नुकसान छात्रों को उठाना पड़ रहा है।
प्रिंसिपल और विशेष शिक्षकों की भारी कमी
देवेन्द्र यादव ने कहा कि दिल्ली के 1057 सरकारी स्कूलों में 950 प्रिंसिपल के पद स्वीकृत हैं, लेकिन केवल 203 प्रिंसिपल ही कार्यरत हैं। इसके अलावा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए स्पेशल टीचरों की कमी भी गंभीर चिंता का विषय है। दिव्यांग छात्रों की पढ़ाई सीधे तौर पर प्रभावित हो रही है।
कौशल और व्यावसायिक शिक्षा पर भी असर
सरकार जहां स्टार्टअप, कौशल विकास और उद्योग से जुड़ी शिक्षा की बड़ी-बड़ी बातें करती है, वहीं इन पाठ्यक्रमों के लिए स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की जा रही। अधिकांश जगहों पर आधी क्षमता से भी कम गेस्ट टीचर तैनात हैं, जिससे व्यावसायिक शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
समान काम, समान वेतन की मांग
देवेन्द्र यादव ने संविधान में निहित समानता और गरिमा के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि समान काम के लिए समान वेतन का अधिकार सभी शिक्षकों पर लागू होना चाहिए। वर्तमान में गेस्ट शिक्षकों को पीजीटी के लिए 1445 रुपये, टीजीटी को 1403 रुपये और प्राथमिक शिक्षकों को 1364 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं, जबकि उन्हें मेडिकल जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं दी जातीं।