अटेरना गांव में फसल अवशेष प्रबंधन कार्यों का निरीक्षण करते विश्व बैंक के अधिकारी।
सोनीपत जिले के अटेरना गांव में अटेरना गांव फसल अवशेष प्रबंधन निरीक्षण के तहत मंगलवार को एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और तकनीकी समीक्षा की गई। विश्व बैंक के अधिकारियों ने हरियाणा में संचालित “स्वस्थ हवा परियोजना” के अंतर्गत चल रहे फसल अवशेष प्रबंधन कार्यों का जमीनी स्तर पर आकलन किया। यह निरीक्षण न केवल कृषि तकनीकों की समीक्षा तक सीमित रहा, बल्कि किसानों की भागीदारी और पर्यावरणीय प्रयासों को समझने का भी अवसर बना।
इस निरीक्षण का नेतृत्व कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सहायक कृषि अभियंता नवीन हुड्डा ने किया। अधिकारियों ने खेतों, किसान समूहों और स्थानीय कृषि नवाचारों का अवलोकन कर यह समझने की कोशिश की कि पराली प्रबंधन के प्रयास किस हद तक प्रभावी और टिकाऊ साबित हो रहे हैं।
स्वस्थ हवा परियोजना का उद्देश्य और पृष्ठभूमि
हरियाणा में पराली जलाने की समस्या लंबे समय से वायु प्रदूषण का बड़ा कारण रही है। इसी चुनौती से निपटने के लिए राज्य सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सहयोग से “स्वस्थ हवा परियोजना” को लागू किया गया। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य फसल अवशेषों के वैज्ञानिक प्रबंधन को बढ़ावा देना, किसानों को वैकल्पिक तकनीकें उपलब्ध कराना और प्रदूषण को कम करना है।
अटेरना गांव फसल अवशेष प्रबंधन निरीक्षण इसी व्यापक योजना का हिस्सा था, जिसमें यह परखा गया कि सरकारी योजनाएं और अनुदान जमीनी स्तर पर कितनी प्रभावी ढंग से लागू हो रहे हैं।
विश्व बैंक के विशेषज्ञों की भागीदारी
निरीक्षण दल में विश्व बैंक की यूरोप महाद्वीप से पर्यावरण विशेषज्ञ नताशा और सामाजिक विशेषज्ञ स्वाति डोगरा शामिल रहीं। दोनों विशेषज्ञों ने गांव में अपनाए जा रहे फसल अवशेष प्रबंधन मॉडल को न केवल तकनीकी दृष्टि से देखा, बल्कि इसके सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों का भी आकलन किया।
अधिकारियों ने अटेरना ऑर्गेनिक फार्मर्स प्रोड्यूस कंपनी (एफपीओ) का दौरा किया, जहां किसानों द्वारा सामूहिक रूप से अपनाए गए नवाचारों को प्रस्तुत किया गया। यह एफपीओ क्षेत्र में टिकाऊ खेती और पर्यावरण संरक्षण का एक उदाहरण बनकर उभरा है।
पराली से ऊर्जा और मूल्य संवर्धन की पहल
निरीक्षण के दौरान अधिकारियों को बताया गया कि एफपीओ द्वारा पराली की गांठों का उपयोग बॉयलर में किया जा रहा है। इसी ऊर्जा से स्वीट कॉर्न की पैकिंग का कार्य हो रहा है। इस पहल को विश्व बैंक के अधिकारियों ने पर्यावरण संरक्षण और संसाधनों के पुनः उपयोग की दिशा में एक सराहनीय मॉडल बताया।
यह प्रयोग दर्शाता है कि पराली को बोझ नहीं, बल्कि एक उपयोगी संसाधन के रूप में देखा जा सकता है। इससे किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ प्रदूषण को भी नियंत्रित किया जा सकता है।
आधुनिक कृषि यंत्रों का प्रदर्शन
कृषि विभाग द्वारा मौके पर फसल अवशेष प्रबंधन से जुड़े आधुनिक कृषि यंत्रों की प्रदर्शनी लगाई गई। इसमें बेलर, स्ट्रॉ रेक, रोटरी स्लेशर जैसे उपकरण शामिल थे। अधिकारियों ने इन यंत्रों की कार्यप्रणाली को समझा और किसानों से इनके उपयोग से जुड़े अनुभव भी सुने।
अटेरना गांव फसल अवशेष प्रबंधन निरीक्षण के दौरान यह भी जानकारी दी गई कि हरियाणा सरकार इन यंत्रों पर अनुदान और प्रोत्साहन राशि उपलब्ध करा रही है, ताकि अधिक से अधिक किसान पराली जलाने के बजाय वैज्ञानिक विकल्प अपनाएं।
किसानों से सीधा संवाद और अनुभव साझा
निरीक्षण की एक महत्वपूर्ण कड़ी किसानों के साथ सीधा संवाद रही। विश्व बैंक के अधिकारियों ने किसानों से पूछा कि सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें कितनी आसानी से मिल रहा है और किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। किसानों ने भी खुले तौर पर अपने अनुभव, समस्याएं और सुझाव साझा किए।
इस मौके पर पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित कंवल सिंह चौहान, राहुल चौहान, बलबीर भैरा (बलीपुर), जेई संदीप सहित बड़ी संख्या में किसान उपस्थित रहे। उनकी उपस्थिति ने इस कार्यक्रम को और अधिक व्यावहारिक और अनुभव आधारित बना दिया।
प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का सहयोग
यह निरीक्षण इस बात का संकेत है कि स्थानीय प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं मिलकर कृषि और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर गंभीरता से काम कर रही हैं। अटेरना गांव फसल अवशेष प्रबंधन निरीक्षण के माध्यम से यह स्पष्ट हुआ कि नीतिगत निर्णयों के साथ-साथ जमीनी स्तर पर नवाचार और किसान सहभागिता भी उतनी ही जरूरी है।
भविष्य की दिशा
अधिकारियों ने संकेत दिए कि ऐसे सफल मॉडलों को अन्य गांवों में भी अपनाने की योजना बनाई जा सकती है। यदि अटेरना जैसे प्रयोग व्यापक स्तर पर लागू होते हैं, तो हरियाणा में पराली जलाने की समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
इस खबर का असर क्या होगा?
इस निरीक्षण का सबसे बड़ा असर यह होगा कि फसल अवशेष प्रबंधन के सफल उदाहरणों को नीति निर्माण में शामिल किया जा सकेगा। किसानों का भरोसा बढ़ेगा कि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ उनकी आय में भी सुधार संभव है। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हरियाणा के प्रयासों को पहचान मिलने से भविष्य में तकनीकी और वित्तीय सहयोग के नए अवसर भी खुल सकते हैं।