विद्यार्थी मोबाइल उपयोग करते हुए, डिजिटल प्रदूषण पर जागरूकता संदेश
पलवल में डिजिटल उपकरणों के बढ़ते उपयोग को लेकर प्रशासन ने गंभीर चिंता जताई है। डिजिटल प्रदूषण को सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए उभरती चुनौती बताते हुए उपायुक्त डॉ. हरीश कुमार वशिष्ठ ने विद्यार्थियों और युवाओं से स्क्रीन टाइम कम करने की अपील की है।उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीक जीवन का हिस्सा है, लेकिन उसका असंतुलित उपयोग नई पीढ़ी के शारीरिक और मानसिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। मोबाइल, कंप्यूटर और टीवी का अत्यधिक इस्तेमाल अब एक आदत के रूप में सामने आ रहा है, जो धीरे-धीरे समस्या का रूप ले सकता है।
डिजिटल प्रदूषण बन रहा नई पीढ़ी के लिए खतरा
उपायुक्त ने कहा कि डिजिटल प्रदूषण केवल एक तकनीकी शब्द नहीं, बल्कि एक सामाजिक वास्तविकता है। लगातार स्क्रीन के सामने रहने से आंखों में जलन, सिरदर्द, अनिद्रा और तनाव जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। इससे विद्यार्थियों की एकाग्रता, भावनात्मक संतुलन और पारिवारिक संवाद प्रभावित हो रहा है।विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया और ऑनलाइन मनोरंजन की लत बच्चों को वास्तविक जीवन के अनुभवों से दूर कर रही है। इसके कारण व्यवहार में चिड़चिड़ापन और सामाजिक दूरी जैसे लक्षण भी सामने आ रहे हैं।
प्रशासन की सलाह: संतुलित उपयोग ही समाधान
उपायुक्त ने सुझाव दिया कि विद्यार्थी प्रतिदिन मोबाइल और कंप्यूटर का उपयोग सीमित समय तक ही करें। पढ़ाई के दौरान 30 से 40 मिनट के अंतराल पर छोटा विराम लेना चाहिए, ताकि आंखों और दिमाग को आराम मिल सके।उन्होंने अभिभावकों और शिक्षकों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। घर और स्कूल, दोनों स्थानों पर बच्चों को डिजिटल अनुशासन सिखाना आवश्यक है। खेलकूद, योग, पुस्तक पठन और रचनात्मक गतिविधियों को दिनचर्या में शामिल करना संतुलन बनाए रखने में सहायक हो सकता है।
स्कूलों में जागरूकता और शोध की पहल
पलवल स्थित एक निजी विद्यालय द्वारा ‘डिजिटल प्रदूषण एवं उसके बच्चों, परिवारों और समुदाय पर प्रभाव’ विषय पर फील्ड रिसर्च की गई। इस अध्ययन में कक्षा 5 से 11 तक के 205 विद्यार्थियों ने शोधकर्ता के रूप में भाग लिया।विद्यार्थियों ने सर्वेक्षण, साक्षात्कार और समूह चर्चा के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया कि डिजिटल उपकरणों का बढ़ता उपयोग किस प्रकार पारिवारिक और सामाजिक जीवन को प्रभावित कर रहा है। अध्ययन में पाया गया कि संतुलित डिजिटल उपयोग, पारिवारिक सहभागिता और बाहरी गतिविधियों को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर बढ़ता दबाव
विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों में नींद की कमी, ध्यान भटकाव और तनाव की समस्या को बढ़ा सकता है। लगातार डिजिटल सामग्री देखने से मस्तिष्क को पर्याप्त विश्राम नहीं मिल पाता।उपायुक्त ने कहा कि विद्यार्थियों को वास्तविक जीवन की चुनौतियों को समझने और सामाजिक जागरूकता विकसित करने के अवसर मिलने चाहिए। तकनीक का उपयोग सीखने और विकास के लिए होना चाहिए, न कि निर्भरता का कारण बनने के लिए।
इस खबर का असर क्या होगा?
डिजिटल प्रदूषण को लेकर प्रशासन की यह चेतावनी अभिभावकों, शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। यदि समय रहते स्क्रीन टाइम को नियंत्रित नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और बढ़ सकती हैं।जागरूकता बढ़ने से परिवारों में संवाद को प्रोत्साहन मिलेगा और स्कूलों में डिजिटल संतुलन को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जा सकता है। इससे बच्चों का समग्र विकास सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।