अरावली पहाड़ियों को बचाने की मांग को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन।
भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल अरावली पहाड़ियाँ एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गई हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की परिभाषा से जुड़े अपने पहले के आदेश पर रोक लगा दी है, जिसके बाद पर्यावरण संरक्षण, खनन नियमों और सरकारी नीतियों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
नवंबर में दिए गए आदेश में अदालत ने स्थानीय जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले भू-भाग को अरावली क्षेत्र मानने की बात कही थी। इस पर पर्यावरण विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि अरावली की अधिकांश पहाड़ियाँ कम ऊंचाई वाली हैं, लेकिन वे भूजल संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और मरुस्थलीकरण रोकने में अहम भूमिका निभाती हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश पर रोक लगाते हुए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया है, जो वैज्ञानिक आधार पर नई परिभाषा सुझाएगी। मामले की अगली सुनवाई जनवरी 2026 में होने की संभावना है।
इस फैसले के बाद #SaveAravalli अभियान के तहत दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा में विरोध प्रदर्शन भी देखे गए। छात्रों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों ने आशंका जताई कि सीमित परिभाषा से अवैध खनन और निर्माण गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है।
सरकार की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि नई परिभाषा का उद्देश्य खनन को नियंत्रित करना है, न कि अरावली क्षेत्र की सुरक्षा को कमजोर करना। हालांकि, अवैध खनन के पुराने मामलों को देखते हुए विशेषज्ञ सख्त निगरानी की मांग कर रहे हैं।
अरावली से जुड़ा यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि पर्यावरण संतुलन और भविष्य की पीढ़ियों से भी जुड़ा हुआ है।