छांयसा गांव मौत मामला में केंद्रीय टीम द्वारा स्वास्थ्य जांच करते हुए
हरियाणा के पलवल जिले में उभरे छांयसा गांव मौत मामला ने स्वास्थ्य प्रशासन को सतर्क कर दिया है। गांव में सामने आए मौत और गंभीर बीमारी के मामलों के बाद केंद्रीय विशेषज्ञों की टीम ने जिला मुख्यालय और प्रभावित क्षेत्र का दौरा कर हालात का गहन आकलन किया। शुरुआती जांच में तीव्र लिवर फेलियर के लक्षण सामने आने से मामले की गंभीरता और बढ़ गई है।स्थानीय प्रशासन के अनुसार, प्रभावित परिवारों से सीधे संवाद कर घटनाक्रम की कड़ियों को समझने की कोशिश की जा रही है। मेडिकल रिकॉर्ड, पर्यावरणीय परिस्थितियों और पेयजल स्रोतों की समानांतर जांच शुरू कर दी गई है, ताकि बीमारी के संभावित कारणों का स्पष्ट निर्धारण हो सके।
छांयसा गांव मौत मामला: जांच में क्या सामने आया
उपायुक्त डॉ. हरीश कुमार वशिष्ठ ने बताया कि अब तक जिन मामलों की समीक्षा की गई है, उनमें तीव्र लिवर फेलियर की स्थिति समान रूप से पाई गई। मरीजों के जीवन रक्षक संकेतों में अचानक गिरावट और मल्टी ऑर्गन फेलियर जैसी जटिलताएं दर्ज की गईं।स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक गांव में अब तक सात मौतें दर्ज हुई हैं। जांच के दौरान चार मामलों में हेपेटाइटिस बी और सत्रह मामलों में हेपेटाइटिस सी की पुष्टि हुई है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल हेपेटाइटिस बी या सी से इस तरह अचानक गंभीर मृत्यु की आशंका अपेक्षाकृत कम होती है, इसलिए अन्य संभावित संक्रमणों की जांच भी आवश्यक मानी जा रही है।
अन्य बीमारियों की जांच पर जोर
केंद्रीय टीम ने हेपेटाइटिस ए और ई के अलावा लेप्टोस्पायरोसिस तथा स्क्रब टायफस की जांच को प्राथमिकता देने का सुझाव दिया है। पेट दर्द, उल्टी और पीलिया जैसे लक्षणों वाले व्यक्तियों की पहचान के लिए घर-घर सर्वे अभियान चलाने की सिफारिश की गई है।अब तक लगभग 1800 लोगों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है। 1660 रक्त नमूनों की जांच की गई है और 118 लोगों का हेपेटाइटिस टीकाकरण किया गया है। इसके साथ ही 15 हजार से अधिक क्लोरीन की गोलियों का वितरण किया गया है, ताकि पेयजल को शुद्ध रखने में सहायता मिल सके।
पेयजल स्रोत और स्वच्छता पर विशेष ध्यान
जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया कि गांव के अधिकांश घरों में पानी की आपूर्ति टैंकरों के माध्यम से हो रही है, जबकि कुछ परिवार आरओ सप्लायर से पानी ले रहे हैं। ग्रामीण दैनिक उपयोग और पेयजल को ‘कुंडियों’ में संग्रहित करते हैं। विशेषज्ञों ने इन कुंडियों की नियमित सफाई और शुद्धिकरण की आवश्यकता पर बल दिया है।केंद्रीय समिति ने पेयजल की केमिकल एनालिसिस और हेवी मेटल्स की जांच कराने के निर्देश दिए हैं। प्रशासन ने पानी के सभी स्रोतों की नियमित निगरानी सुनिश्चित करने को कहा है। साथ ही गांव में फॉगिंग करवाई गई है और स्वच्छता अभियान को तेज किया गया है।
मेडिकल कॉलेज में केस समीक्षा
केंद्रीय टीम ने नल्हड़ स्थित मेडिकल कॉलेज का भी दौरा कर मृतक और भर्ती मरीजों के केस रिकॉर्ड की समीक्षा की। चिकित्सकों से विस्तृत चर्चा के बाद बीमारी की प्रकृति और उपचार पद्धति का विश्लेषण किया गया।सिविल सर्जन डॉ. सत्येंद्र वशिष्ठ के अनुसार गांव में स्वास्थ्य विभाग की टीम 24 घंटे कैंप कर रही है। संदिग्ध लक्षणों वाले व्यक्तियों को तुरंत चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है और ग्रामीणों को उबला हुआ पानी पीने तथा हाथ धोने की आदत अपनाने के लिए जागरूक किया जा रहा है।
प्रशासनिक बैठक और समन्वय
उपायुक्त की अध्यक्षता में संबंधित विभागों की विशेष बैठक आयोजित कर पेयजल आपूर्ति, स्वच्छता और स्वास्थ्य निगरानी को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए। प्रशासन ने आश्वस्त किया है कि विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर त्वरित और ठोस कदम उठाए जाएंगे।
इस घटनाक्रम ने ग्रामीण स्वास्थ्य सुरक्षा और जल गुणवत्ता निगरानी तंत्र की अहमियत को रेखांकित किया है। फिलहाल प्राथमिक लक्ष्य स्थिति को नियंत्रण में रखना और बीमारी के मूल कारण की वैज्ञानिक पहचान करना है।
इस खबर का असर क्या होगा?
छांयसा गांव मौत मामला केवल एक स्थानीय स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में जल गुणवत्ता और रोग निगरानी व्यवस्था की व्यापक समीक्षा का संकेत भी है। यदि जांच में जल स्रोतों या अन्य संक्रमणों की पुष्टि होती है, तो राज्य स्तर पर पेयजल प्रबंधन और स्वास्थ्य सर्विलांस प्रणाली को और सुदृढ़ करने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं।ग्रामीणों के लिए यह चेतावनी भी है कि स्वच्छ जल उपयोग और व्यक्तिगत स्वच्छता को प्राथमिकता दें। दीर्घकाल में यह मामला सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति में सुधार और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत करने की दिशा में प्रभाव डाल सकता है।
निष्कर्ष
प्रशासन और केंद्रीय विशेषज्ञों की सक्रियता ने स्पष्ट कर दिया है कि छांयसा गांव मौत मामला गंभीरता से लिया जा रहा है। बीमारी के कारणों की वैज्ञानिक जांच और सतत निगरानी से ही स्थिति पर प्रभावी नियंत्रण संभव होगा। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट इस मामले की दिशा तय करेगी, लेकिन फिलहाल सतर्कता और पारदर्शिता ही सबसे बड़ा उपाय है।