दिल्ली के गाजीपुर लैंडफिल पर जमा कचरे का पहाड़, जो पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
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दिल्ली : में बढ़ते कचरे और उससे जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। दिल्ली लैंडफिल प्रदूषण के मुद्दे पर दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष देवेंद्र यादव ने राजधानी में हवा और भूमिगत जल की बिगड़ती स्थिति पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि लैंडफिल साइटों के आसपास रहने वाले लोगों को प्रदूषित हवा और दूषित पानी के कारण कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
नई दिल्ली में जारी बयान में उन्होंने कहा कि राजधानी के तीन प्रमुख लैंडफिल—भलस्वा, गाजीपुर और ओखला—लंबे समय से अपनी क्षमता से अधिक कचरा संभाल रहे हैं। इन साइटों पर प्रतिदिन बड़ी मात्रा में कचरा डाले जाने से पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
दिल्ली में कचरा प्रबंधन की बढ़ती चुनौती
दिल्ली जैसे विशाल महानगर में ठोस कचरा प्रबंधन एक जटिल चुनौती बन चुका है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार राजधानी में हर दिन लगभग 11,800 मीट्रिक टन कचरा उत्पन्न होता है। इसका एक बड़ा हिस्सा प्रोसेसिंग प्लांट्स में निस्तारित किया जाता है, लेकिन शेष कचरा लैंडफिल साइटों पर जमा होता रहता है।
समय के साथ इन लैंडफिल स्थलों पर कूड़े के विशाल ढेर बन चुके हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार जब कचरा लंबे समय तक खुले में पड़ा रहता है तो उससे निकलने वाली गैसें और रसायन आसपास के वातावरण को प्रभावित करने लगते हैं। यही कारण है कि लैंडफिल साइटों के पास रहने वाले लोगों को अक्सर दुर्गंध, धुएं और धूल का सामना करना पड़ता है।इसके अलावा कई बार कचरे में आग लगने की घटनाएं भी सामने आती हैं, जिससे वायु प्रदूषण और अधिक बढ़ जाता है।
लैंडफिल के पास भूजल की गुणवत्ता पर सवाल
देवेंद्र यादव के अनुसार लैंडफिल साइटों के आसपास के क्षेत्रों में भूमिगत जल की गुणवत्ता को लेकर चिंताजनक संकेत मिले हैं। उन्होंने कहा कि विभिन्न कॉलोनियों में लिए गए भूजल नमूनों में कई रासायनिक तत्व सामान्य मानकों से कई गुना अधिक पाए गए हैं।
जांच में टीडीएस, क्लोराइड और कैल्शियम जैसे तत्वों का स्तर काफी ऊंचा दर्ज किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति उस समय पैदा होती है जब कचरे से निकलने वाला तरल पदार्थ, जिसे लीचेट कहा जाता है, जमीन में रिसकर भूजल तक पहुंच जाता है।लीचेट अत्यधिक प्रदूषित होता है और यदि इसे नियंत्रित न किया जाए तो यह लंबे समय तक जल स्रोतों को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि लैंडफिल प्रबंधन में वैज्ञानिक तरीके अपनाना आवश्यक माना जाता है।
स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव
प्रदूषित हवा और दूषित पानी का असर सीधे लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। चिकित्सकों के अनुसार ऐसे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में खांसी, सांस लेने में तकलीफ, त्वचा रोग और एलर्जी जैसी समस्याएं अधिक देखी जाती हैं।लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से हृदय और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है। इसके अलावा लगातार खराब पर्यावरणीय परिस्थितियों में रहने से मानसिक तनाव और चिंता जैसी समस्याओं के मामले भी सामने आते हैं।स्थानीय निवासियों का कहना है कि लैंडफिल के आसपास रहने के कारण उन्हें धुएं और बदबू का सामना करना पड़ता है, जिससे दैनिक जीवन प्रभावित होता है।
वर्तमान राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिक्रिया
देवेंद्र यादव ने अपने बयान में आरोप लगाया कि लैंडफिल समस्या को लेकर ठोस और दीर्घकालिक समाधान की दिशा में पर्याप्त प्रगति नहीं हो पाई है। उनका कहना है कि वर्षों से कूड़े के पहाड़ों को कम करने के लिए कई योजनाएं घोषित की गईं, लेकिन स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिखाई दे रहा।
उन्होंने यह भी कहा कि राजधानी में वायु गुणवत्ता सूचकांक कई बार चिंताजनक स्तर तक पहुंच जाता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2026 के फरवरी महीने में औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 232 दर्ज किया गया, जिसे स्वास्थ्य के लिए जोखिमपूर्ण श्रेणी में माना जाता है।पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि कचरा प्रबंधन, प्रदूषण नियंत्रण और शहरी नियोजन के बेहतर समन्वय से ही इस समस्या का स्थायी समाधान संभव है।
समाधान की दिशा में आवश्यक कदम
विशेषज्ञों के अनुसार लैंडफिल समस्या को कम करने के लिए कई स्तरों पर कार्रवाई की आवश्यकता है। सबसे पहले कचरे के स्रोत पर ही पृथक्करण को प्रभावी बनाना जरूरी है ताकि रीसाइक्लिंग और प्रोसेसिंग को बढ़ावा मिल सके।इसके अलावा पुराने कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण, आधुनिक वेस्ट-टू-एनर्जी तकनीक और पर्यावरण निगरानी तंत्र को मजबूत करना भी महत्वपूर्ण माना जाता है। लैंडफिल साइटों के आसपास रहने वाले लोगों के लिए स्वास्थ्य जांच और स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था भी आवश्यक है।
अंततः, दिल्ली लैंडफिल प्रदूषण केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर चुनौती भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसका प्रभाव आने वाले वर्षों में और अधिक व्यापक हो सकता है।