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दिल्ली में डे केयर कैंसर सेंटर अब तक क्यों शुरू नहीं?

दिल्ली में डे केयर कैंसर सेंटर अब तक क्यों शुरू नहीं?
Pankaj Gupta February 13, 2026 1 minute read
दिल्ली में डे केयर कैंसर सेंटर की प्रस्तावित सुविधा

राजधानी में प्रस्तावित डे केयर कैंसर सेंटर से मरीजों को स्थानीय स्तर पर उपचार की उम्मीद।

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राजधानी में तेजी से बढ़ रहे कैंसर मामलों के बीच दिल्ली में डे केयर कैंसर सेंटर अब तक शुरू न हो पाना गंभीर सार्वजनिक चिंता का विषय बन गया है। बढ़ते प्रदूषण, दूषित जल और बदलती जीवनशैली के कारण स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहे हैं, वहीं इलाज की बुनियादी सुविधाओं को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष देवेंद्र यादव ने आरोप लगाया है कि केंद्र और राज्य स्तर पर घोषणाएं होने के बावजूद मरीजों को राहत देने वाली सुविधाएं धरातल पर नहीं उतर पाईं। उन्होंने इसे स्वास्थ्य प्रबंधन में संवेदनहीनता बताया।

दिल्ली में डे केयर कैंसर सेंटर की योजना क्या थी?

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वर्ष 2025-26 के बजट में देशभर में 297 डे केयर कैंसर सेंटर स्थापित करने की घोषणा की थी। उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार अब तक 102 केंद्र ही स्थापित हो पाए हैं। गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और उपचार के लिए दिल्ली को 11.07 करोड़ रुपये का आवंटन भी किया गया था।

योजना के अनुसार प्रत्येक डे केयर कैंसर सेंटर में 4–6 बिस्तर, दो नर्सें, एक फार्मासिस्ट, एक परामर्शदाता, एक मल्टी-टास्किंग स्टाफ और एक ऑन्कोलॉजिस्ट या प्रशिक्षित चिकित्सा अधिकारी की नियुक्ति प्रस्तावित थी। इन केंद्रों का उद्देश्य कीमोथेरेपी जैसी प्रक्रियाओं को बड़े अस्पतालों पर निर्भरता कम करते हुए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराना था।

बढ़ते कैंसर मामले और स्वास्थ्य परिदृश्य

आईसीएमआर के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में दिल्ली में कैंसर के 28,387 मामले दर्ज हुए, जबकि 2023 में यह संख्या 27,561 थी। विशेषज्ञों का अनुमान है कि चालू वर्ष में मामलों में लगभग 23 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है।

रिपोर्टों के मुताबिक 2025 में मुंह और गले के कैंसर के मामले लगभग 44 प्रतिशत तक पहुंच चुके हैं। इसके अलावा स्तन कैंसर (9 प्रतिशत) और गॉल ब्लैडर कैंसर (5 प्रतिशत) भी चिंता का कारण हैं। 40 से 50 वर्ष आयु वर्ग में कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी विशेष रूप से देखी जा रही है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ प्रदूषण में मौजूद पीएम 2.5 कणों और दूषित पेयजल को प्रमुख जोखिम कारक मानते हैं। दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक लंबे समय से गंभीर श्रेणी में बना रहता है, जिससे श्वसन तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

स्वीकृत अस्पतालों में स्थिति

जुलाई 2025 में चार सरकारी अस्पतालों— दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल, राव तुलाराम मेमोरियल अस्पताल, जनकपुरी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल और पंडित मदन मोहन मालवीय अस्पताल — को डे केयर कैंसर सेंटर के रूप में स्वीकृति दी गई थी।

सूत्रों के अनुसार इन अस्पतालों के जनरल ड्यूटी मेडिकल अधिकारियों और नर्सिंग स्टाफ को विशेष प्रशिक्षण भी दिया गया। इसके बावजूद केंद्र अब तक पूरी तरह से संचालित नहीं हो सके हैं। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि परियोजना अभी तैयारी के चरण में है और मानव संसाधन की नियुक्ति प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है।

जवाबदेही और प्रशासनिक सवाल

राजनीतिक बयानबाजी के बीच मुख्य प्रश्न यह है कि बजट आवंटन और प्रशासनिक स्वीकृति के बाद भी कार्यान्वयन में देरी क्यों हो रही है। संसदीय समिति ने अलग से प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की नियुक्ति की सिफारिश की थी, ताकि मौजूदा अस्पताल स्टाफ पर अतिरिक्त दबाव न पड़े।

दिल्ली में पिछले दो दशकों में कैंसर से लगभग 1.1 लाख मौतें दर्ज की जा चुकी हैं। वर्ष 2024 में ही करीब 7,400 लोगों की मृत्यु कैंसर के कारण हुई। राष्ट्रीय स्तर पर हर वर्ष लगभग 15 लाख नए मामले सामने आते हैं और अनुमान है कि वर्ष 2045 तक यह संख्या 25 लाख तक पहुंच सकती है।

इन आंकड़ों के बीच राजधानी में कैंसर उपचार सुविधाओं का विस्तार समय की मांग माना जा रहा है।

इस खबर का असर क्या होगा?

दिल्ली में डे केयर कैंसर सेंटर शुरू न होने का सीधा प्रभाव उन मरीजों पर पड़ता है जिन्हें नियमित कीमोथेरेपी या फॉलो-अप उपचार की आवश्यकता होती है। बड़े अस्पतालों में लंबी प्रतीक्षा सूची और सीमित बिस्तरों के कारण उपचार में देरी हो सकती है।

यदि ये केंद्र शीघ्र शुरू होते हैं तो मरीजों को स्थानीय स्तर पर सुलभ उपचार मिलेगा, अस्पतालों पर भार कम होगा और समय पर इलाज संभव हो सकेगा। वहीं देरी जारी रहने पर स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता और राजनीतिक जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न बने रहेंगे।

निष्कर्ष

राजधानी में कैंसर के बढ़ते मामलों के बीच दिल्ली में डे केयर कैंसर सेंटर का संचालन केवल एक प्रशासनिक परियोजना नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की अनिवार्य आवश्यकता है। बजट आवंटन, प्रशिक्षण और स्वीकृति के बावजूद क्रियान्वयन में विलंब नीति और प्रबंधन दोनों पर गंभीर प्रश्न उठाता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर कदम उठाए बिना आने वाले वर्षों में स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है। ऐसे में सरकार और स्वास्थ्य विभाग के लिए पारदर्शी कार्ययोजना और शीघ्र कार्रवाई आवश्यक होगी।

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