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जैनपुर प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण में 55 किसान शामिल

जैनपुर प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण में 55 किसान शामिल
IST Digital Team February 21, 2026
जैनपुर प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल किसान और विशेषज्ञ

जैनपुर प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल किसान और विशेषज्ञ

सोनीपत जिले के जैनपुर गांव में जैनपुर प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत किसानों को टिकाऊ कृषि पद्धतियों की व्यावहारिक जानकारी दी जा रही है। तीन दिवसीय इस प्रशिक्षण में जिले के 55 किसान सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं। आयोजन का उद्देश्य रासायनिक खेती से अलग हटकर प्राकृतिक संसाधनों आधारित खेती को बढ़ावा देना है।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते जलवायु परिदृश्य और बढ़ती लागत के बीच प्राकृतिक खेती किसानों के लिए एक व्यवहारिक विकल्प बनकर उभर रही है। इसी दिशा में यह प्रशिक्षण कार्यक्रम किसानों को वैज्ञानिक समझ और व्यावहारिक तकनीक से जोड़ने का प्रयास है।

जैनपुर प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण का उद्देश्य और रूपरेखा

यह कार्यक्रम कृषि विज्ञान केंद्र, सोनीपत के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। प्रशिक्षण में उन किसानों को प्राथमिकता दी गई है जो पहले ऐसे कार्यक्रमों में शामिल नहीं हो पाए थे। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि प्राकृतिक खेती से जुड़े सरकारी अनुदान का लाभ लेने के लिए निर्धारित प्रशिक्षण पूरा करना आवश्यक है।

प्रशिक्षण के दौरान किसानों को प्राकृतिक इनपुट तैयार करने, जैविक घोल बनाने और फसल विविधीकरण के तरीकों की जानकारी दी गई। साथ ही यह भी बताया गया कि कम लागत में अधिक उत्पादन कैसे संभव है।

मृदा स्वास्थ्य पर विशेष जोर

कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिकों ने मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने में सूक्ष्म जीवों की भूमिका को विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से मिट्टी की संरचना प्रभावित होती है, जबकि प्राकृतिक तरीकों से मिट्टी की गुणवत्ता लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सकती है।

केंचुआ खाद उत्पादन की प्रक्रिया पर भी विस्तृत चर्चा हुई। किसानों को बताया गया कि वर्मी कम्पोस्ट न केवल मिट्टी की संरचना सुधारता है, बल्कि फसल की उत्पादकता भी बढ़ाता है। इससे उर्वरक लागत में कमी आती है और पर्यावरणीय संतुलन भी बना रहता है।

कीट एवं रोग प्रबंधन की जानकारी

प्राकृतिक खेती में कीट प्रबंधन एक महत्वपूर्ण विषय रहा। विशेषज्ञों ने धान, गेहूं और सब्जियों में लगने वाले प्रमुख कीटों और रोगों की पहचान के तरीके बताए। रासायनिक दवाओं के विकल्प के रूप में जैविक घोल और प्राकृतिक उपायों के प्रयोग पर जोर दिया गया।

सब्जियों में फल मक्खी नियंत्रण के लिए फिरोमोन ट्रैप के उपयोग को प्रभावी और किफायती बताया गया। किसानों को समझाया गया कि समय पर निगरानी और जैविक उपाय अपनाकर फसल नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है।

सीधी बिक्री और बाजार से जुड़ाव

प्रशिक्षण में प्राकृतिक उत्पादों की सीधी बिक्री के मॉडल पर भी चर्चा की गई। किसानों को सुझाव दिया गया कि वे बिचौलियों पर निर्भर रहने के बजाय उपभोक्ताओं से सीधे संपर्क स्थापित करें। स्थानीय मंडियों, किसान बाजार और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से बेहतर मूल्य प्राप्त किया जा सकता है।

विशेषज्ञों ने कहा कि यदि किसान संगठित होकर समूह आधारित विपणन अपनाएं तो उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। प्राकृतिक उत्पादों की मांग शहरी क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही है, जिसका लाभ ग्रामीण उत्पादक उठा सकते हैं।

किसानों की सहभागिता

कार्यक्रम के दौरान किसानों ने अपने अनुभव साझा किए और विशेषज्ञों से सवाल पूछे। कई किसानों ने बताया कि वे आंशिक रूप से प्राकृतिक खेती अपना चुके हैं और बेहतर परिणाम मिल रहे हैं। आगामी सत्रों में उन्नत तकनीकों और व्यावहारिक प्रदर्शन पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

टिकाऊ कृषि की ओर बढ़ता कदम

विशेषज्ञों का मानना है कि प्राकृतिक खेती केवल उत्पादन तकनीक नहीं, बल्कि एक समग्र कृषि दर्शन है। इससे लागत में कमी, मिट्टी की सेहत में सुधार और पर्यावरण संरक्षण संभव है। जैनपुर प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण इसी सोच को जमीनी स्तर तक पहुंचाने का प्रयास है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना समय की आवश्यकता बन चुकी है। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम किसानों को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में प्रेरित कर रहे हैं।

इस खबर का असर क्या होगा?

जैनपुर प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण से जुड़े किसान न केवल आधुनिक और टिकाऊ तकनीकों से परिचित होंगे, बल्कि वे सरकारी योजनाओं और अनुदानों का लाभ भी प्रभावी ढंग से ले सकेंगे। इससे उत्पादन लागत घटने, आय बढ़ने और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी। दीर्घकाल में यह पहल जिले में प्राकृतिक खेती के विस्तार का आधार बन सकती है।

निष्कर्ष

जैनपुर प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण कार्यक्रम किसानों को पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर टिकाऊ और लाभकारी कृषि मॉडल अपनाने का अवसर दे रहा है। यदि प्रशिक्षण में मिली सीख को व्यवहार में उतारा गया, तो यह पहल ग्रामीण क्षेत्र में आर्थिक और पर्यावरणीय सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

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