महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर मनरेगा की बहाली की मांग को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ता मार्च करते हुए
नई दिल्ली में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के अवसर पर शुक्रवार को राजनीतिक माहौल उस समय गर्मा गया, जब दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के नेतृत्व में हजारों कांग्रेस कार्यकर्ता मनरेगा रोजगार योजना की बहाली की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे। यह शांतिमार्च “मनरेगा बचाओ संग्राम” के तहत आयोजित किया गया था, जिसका उद्देश्य केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा को कमजोर किए जाने के आरोपों के खिलाफ जनआवाज़ बुलंद करना था।
गांधी स्मृति तक मार्च की योजना, लेकिन रास्ते में रोका गया
दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष श्री देवेन्द्र यादव की अध्यक्षता में कांग्रेस कार्यकर्ता अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी कार्यालय, 24 अकबर रोड से गांधी स्मृति, 30 जनवरी मार्ग तक शांतिपूर्ण मार्च निकालने के लिए एकत्र हुए। यह मार्च प्रतीकात्मक रूप से महात्मा गांधी की अहिंसा और अधिकारों की लड़ाई को समर्पित था।
हालांकि, मार्च शुरू होते ही पुलिस ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने से रोक दिया। स्थिति तब तनावपूर्ण हो गई जब कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने गांधी स्मृति की ओर बढ़ने का प्रयास किया।
पुलिस कार्रवाई और नेताओं की हिरासत
कांग्रेस का आरोप है कि शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ रहे कार्यकर्ताओं को पुलिस ने रोकते हुए हिरासत में ले लिया। श्री देवेन्द्र यादव सहित बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को पुलिस द्वारा कापसहेड़ा पुलिस स्टेशन ले जाया गया, जहां कुछ समय बाद सभी को रिहा कर दिया गया।
इस दौरान कार्यकर्ताओं ने “मनरेगा वापस लाओ”, “मनरेगा चोर गद्दी छोड़ो”, “मोदी सरकार हाय हाय” और “महात्मा गांधी अमर रहें” जैसे नारे लगाए।
मनरेगा पर कांग्रेस का रुख
शांतिमार्च के दौरान श्री देवेन्द्र यादव ने कहा कि मनरेगा केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि करोड़ों ग्रामीण परिवारों के लिए सम्मान के साथ रोज़गार का अधिकार है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने इस कानून को इसलिए लागू किया था ताकि ग्रामीण भारत के गरीब नागरिकों को काम की गारंटी मिल सके और उन्हें मजबूरी में पलायन न करना पड़े।
उनका आरोप था कि मौजूदा केंद्र सरकार ने मनरेगा को कमजोर कर ग्रामीण मजदूरों के अधिकारों पर सीधा हमला किया है।
गांधी के विचारों से जोड़ा गया आंदोलन
कांग्रेस नेताओं ने मनरेगा को महात्मा गांधी के विचारों से जोड़ते हुए कहा कि गांधी ने अपने जीवन में ग्रामीण भारत, श्रम की गरिमा और आत्मनिर्भरता पर विशेष ज़ोर दिया था। उनके अनुसार, मनरेगा उसी सोच का आधुनिक रूप है, जो ग्रामीणों को आत्मसम्मान के साथ काम करने का अवसर देता है।
कांग्रेस का कहना है कि गांधी की पुण्यतिथि पर यह शांतिमार्च सच्ची श्रद्धांजलि थी।
मनरेगा में बदलावों पर सवाल
श्री देवेन्द्र यादव ने आरोप लगाया कि मनरेगा में किए गए बदलावों से ग्राम पंचायतों की भूमिका कमजोर हुई है और राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डाला गया है। उन्होंने कहा कि पहले मजदूरी का पूरा भुगतान केंद्र सरकार करती थी, जिससे काम देने में देरी नहीं होती थी, लेकिन अब राज्यों को भी खर्च उठाना पड़ रहा है।
इसके कारण ग्रामीण इलाकों में काम मिलने और मजदूरी भुगतान में देरी बढ़ने की आशंका जताई गई।
कांग्रेस का दावा: लंबी लड़ाई के लिए तैयार
कांग्रेस नेतृत्व ने साफ किया कि मनरेगा की बहाली के लिए यह संघर्ष लंबा चलेगा। पार्टी नेताओं ने किसानों के आंदोलन का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे कृषि कानूनों को व्यापक जनआंदोलन के बाद वापस लिया गया, वैसे ही मनरेगा को लेकर भी सरकार को जनदबाव में झुकना पड़ेगा।
कांग्रेस का कहना है कि यह लड़ाई केवल एक योजना की नहीं, बल्कि काम के अधिकार और ग्रामीण सम्मान की लड़ाई है।
मार्च में शामिल प्रमुख नेता
इस शांतिमार्च में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता और संगठन के पदाधिकारी शामिल हुए। इनमें पार्टी के राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर के नेता, पूर्व मंत्री, पूर्व विधायक, महिला कांग्रेस, युवा कांग्रेस, सेवादल और विभिन्न विभागों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने इस आंदोलन को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना दिया।
सार्वजनिक असर और राजनीतिक संदेश
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, गांधी की पुण्यतिथि जैसे प्रतीकात्मक दिन पर मनरेगा को लेकर यह प्रदर्शन केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्ष की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इससे ग्रामीण मुद्दों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में लाने की कोशिश दिखती है।