खरखौदा में आयोजित प्राकृतिक खेती किसान सम्मेलन में राज्यपाल आचार्य देवव्रत
देश में खेती की लागत, गिरती मिट्टी की उर्वरता और किसानों की बढ़ती चुनौतियों के बीच प्राकृतिक खेती को लेकर एक महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। सोनीपत जिले के खरखौदा में आयोजित प्राकृतिक खेती किसान सम्मेलन में किसानों को रासायनिक खेती के विकल्प के रूप में प्राकृतिक खेती अपनाने का स्पष्ट संदेश दिया गया।
इस सम्मेलन में गुजरात और महाराष्ट्र के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया। उन्होंने वैज्ञानिक तथ्यों, व्यावहारिक अनुभवों और सामाजिक दृष्टिकोण के साथ यह बताया कि प्राकृतिक खेती न केवल कम खर्चीली है, बल्कि लंबे समय में किसान, पर्यावरण और समाज—तीनों के लिए लाभकारी सिद्ध होती है।
सम्मेलन का उद्देश्य और पृष्ठभूमि
खरखौदा स्थित भरत वाटिका में आयोजित यह प्राकृतिक खेती किसान सम्मेलन हरियाणा में प्राकृतिक खेती को जन-आंदोलन का रूप देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है। आयोजन का मुख्य उद्देश्य किसानों को रासायनिक खेती से होने वाले नुकसान के प्रति जागरूक करना और उन्हें वैकल्पिक, टिकाऊ कृषि पद्धति से जोड़ना रहा।
हरियाणा जैसे कृषि प्रधान राज्य में लगातार बढ़ती उत्पादन लागत, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता और मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। इसी पृष्ठभूमि में प्राकृतिक खेती को भविष्य की खेती के रूप में प्रस्तुत किया गया।
प्राकृतिक खेती पर आचार्य देवव्रत के विचार
कम खर्च, अधिक स्थायित्व
प्राकृतिक खेती किसान सम्मेलन को संबोधित करते हुए आचार्य देवव्रत ने कहा कि प्राकृतिक खेती पूरी तरह प्रकृति के नियमों पर आधारित है। इसमें किसान को महंगे रासायनिक खाद, कीटनाशक और दवाओं पर निर्भर नहीं रहना पड़ता, जिससे खेती की लागत में उल्लेखनीय कमी आती है।
उन्होंने कहा कि यह पद्धति दीर्घकालिक रूप से लाभकारी है क्योंकि इससे मिट्टी की उर्वरता स्थायी रूप से बढ़ती है और किसान बार-बार कर्ज के चक्र में नहीं फंसता।
देसी गाय और जीवामृत की भूमिका
राज्यपाल ने प्राकृतिक खेती के मूल आधार के रूप में देसी गाय को बताया। उन्होंने वैज्ञानिक तथ्यों के साथ समझाया कि देसी गाय के गोबर और गोमूत्र में करोड़ों लाभकारी सूक्ष्म जीवाणु होते हैं, जो मिट्टी को पुनर्जीवित करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने जीवामृत बनाने की विधि भी विस्तार से समझाई। देसी गाय का गोबर, गोमूत्र, गुड़, दाल का बेसन और खेत की मिट्टी मिलाकर तैयार किया गया जीवामृत खेत में डालने से सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या तेजी से बढ़ती है। इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ती है, केंचुए सक्रिय होते हैं और पौधों को प्राकृतिक पोषण मिलता है।
रासायनिक खेती के दुष्परिणाम
आचार्य देवव्रत ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि हरित क्रांति के दौर में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग आवश्यक था, लेकिन समय के साथ इनका अत्यधिक और असंतुलित प्रयोग भूमि और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए हानिकारक साबित हुआ है।
उन्होंने चिंता जताई कि आज खेतों की मिट्टी से ऑर्गेनिक कार्बन लगभग समाप्त हो चुका है, जिससे उत्पादन घट रहा है। किसान अधिक लागत के बावजूद संतोषजनक पैदावार नहीं ले पा रहा है।
स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रभाव
राज्यपाल ने कहा कि रासायनिक खेती का सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह और किडनी जैसी गंभीर बीमारियों में लगातार वृद्धि हो रही है। शोध में यह भी सामने आया है कि रासायनिक अवशेष मां के दूध तक में पाए जा रहे हैं, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर खतरा है।
उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती अपनाने से न केवल मिट्टी और जल संरक्षण होता है, बल्कि पर्यावरण संतुलन भी बेहतर होता है। वर्षा का पानी भूमि में समाता है और भूजल स्तर को भी संरक्षण मिलता है।
सरकार की भूमिका और नीतिगत समर्थन
प्राकृतिक खेती किसान सम्मेलन में यह भी बताया गया कि केंद्र सरकार ने प्राकृतिक खेती को राष्ट्रीय मिशन के रूप में अपनाया है। हरियाणा सरकार द्वारा प्रशिक्षण केंद्रों के माध्यम से किसानों को नि:शुल्क प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि वे इस पद्धति को सही तरीके से अपना सकें।
आचार्य देवव्रत ने किसानों से आग्रह किया कि वे शुरुआत में अपनी भूमि के एक हिस्से में प्राकृतिक खेती अपनाएं और उसके परिणाम स्वयं देखें।
राजनीतिक और सामाजिक संदेश
सम्मेलन में भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मोहनलाल बड़ौली ने कहा कि प्राकृतिक खेती न केवल किसान की आय बढ़ाएगी, बल्कि देश को आत्मनिर्भर बनाने में भी अहम भूमिका निभाएगी। उन्होंने कहा कि किसान मजबूत होगा तो देश भी मजबूत होगा, क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ खेती है।
विधायक पवन खरखौदा ने इसे किसानों को नई ऊर्जा देने वाला आयोजन बताया और स्वयं प्राकृतिक खेती अपनाने का संकल्प लिया। उन्होंने इसे धरती माता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम बताया।
इस खबर का असर क्या होगा?
प्राकृतिक खेती किसान सम्मेलन का प्रभाव हरियाणा के किसानों पर दूरगामी हो सकता है। इससे किसानों में प्राकृतिक खेती के प्रति विश्वास बढ़ेगा और रासायनिक खेती से धीरे-धीरे दूरी बनने की संभावना है।
लंबी अवधि में यह पहल मिट्टी की उर्वरता, किसान की आय, पर्यावरण संरक्षण और जनस्वास्थ्य—चारों क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव ला सकती है।
निष्कर्ष
प्राकृतिक खेती किसान सम्मेलन केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि खेती और समाज के भविष्य से जुड़ा संदेश है। आचार्य देवव्रत द्वारा दिया गया यह आह्वान स्पष्ट करता है कि टिकाऊ खेती ही आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और समृद्ध भारत की नींव रख सकती है। यदि किसान, समाज और सरकार मिलकर इस दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो कृषि संकट का स्थायी समाधान संभव है।